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mahabharat 8.68.13: यह कार्य चन्द्रमा के तेज, वायु के वेग, मेरुदण्ड की स्थिरता, पृथ्वी की क्षमा, सूर्य के तेज, कुबेर की लक्ष्मी, इन्द्र के पराक्रम और भगवान विष्णु के बल से सम्पन्न होगा॥13॥   |   mahabharat अध्याय 8.68: युधिष्ठिरका अर्जुनके प्रति अपमानजनक क्रोधपूर्ण वचन   ।   mahabharat पर्व 8: कर्ण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 68: युधिष्ठिरका अर्जुनके प्रति अपमानजनक क्रोधपूर्ण वचन  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  8.68.13 
कान्त्या शशाङ्कस्य जवेन वायो:
स्थैर्येण मेरो: क्षमया पृथिव्या:।
सूर्यस्य भासा धनदस्य लक्ष्म्या
शौर्येण शक्रस्य बलेन विष्णो:॥ १३॥
 
 
अनुवाद
यह कार्य चन्द्रमा के तेज, वायु के वेग, मेरुदण्ड की स्थिरता, पृथ्वी की क्षमा, सूर्य के तेज, कुबेर की लक्ष्मी, इन्द्र के पराक्रम और भगवान विष्णु के बल से सम्पन्न होगा॥13॥
 
This will be accomplished by the brightness of the moon, the speed of the wind, the stability of the spine, the forgiveness of the earth, the radiance of the sun, Kuber's Lakshmi, the bravery of Indra and the strength of Lord Vishnu. 13॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)