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श्लोक 8.67.18-19  |
रथप्रवीरेण महानुभाव
द्विषत्सैन्ये वर्तता दुस्तरेण॥ १८॥
समेत्याहं सूतपुत्रेण संख्ये
वृत्रेण वज्रीव नरेन्द्रमुख्य।
योत्स्याम्यहं भारत सूतपुत्र-
मस्मिन् संग्रामे यदि वै दृश्यतेऽद्य॥ १९॥ |
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| अनुवाद |
| महानुभाव! भरतवंशी नृपश्रेष्ठ! यदि मैं आज इस युद्ध में शत्रु सेना में उपस्थित महारथियों में शूतपुत्र वीर दुर्जय के साथ इन्हें देख लूँ, तो मैं इनके साथ रणभूमि में जाकर उसी प्रकार युद्ध करूँगा, जैसे वज्रधारी इन्द्र ने वृत्रासुर के साथ किया था ॥18-19॥ |
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| Excellency! Bharatvanshi Nripashrestha! If I see him today in this battle, along with the brave Durjay, the son of Suta, among the charioteers present in the enemy army, then I will join him in the battlefield and fight in the same way as Indra wielding the thunderbolt did with Vritrasura. 18-19॥ |
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