श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 67: अर्जुनका युधिष्ठिरसे अबतक कर्णको न मार सकनेका कारण बताते हुए उसे मारनेके लिये प्रतिज्ञा करना  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  8.67.10 
अहं हि तं त्रिंशता वज्रकल्पै:
समार्दयं निमिषस्यान्तरेण।
क्षणाच्छ्वावित्समरूपो बभूव
समार्दितो मद्विसृष्टै: पृषत्कै:॥ १०॥
 
 
अनुवाद
फिर पलक झपकते ही मैंने उस पर वज्र के समान प्रबल तीस बाण चलाये। मेरे बाणों से घायल होकर उसका रूप काँटों से आच्छादित साही के समान हो गया।
 
Then in the blink of an eye I struck him with thirty arrows as strong as thunderbolts. After being wounded by my arrows, his appearance started looking like a porcupine covered with thorns.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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