श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 66: युधिष्ठिरका अर्जुनसे भ्रमवश कर्णके मारे जानेका वृत्तान्त पूछना  »  श्लोक 13-14
 
 
श्लोक  8.66.13-14 
अभिसृत्य च मां युद्धे परुषाण्युक्तवान् बहु।
तत्र तत्र युधां श्रेष्ठ परिभूय न संशय:॥ १३॥
भीमसेनप्रभावात्तु यज्जीवामि धनंजय।
बहुनात्र किमुक्तेन नाहं तत् सोढुमुत्सहे॥ १४॥
 
 
अनुवाद
हे वीरों! उसने युद्ध में मेरा पीछा किया है, सब जगह मेरा अपमान किया है और बहुत कठोर वचन कहे हैं - इसमें संशय नहीं है। धनंजय! भीमसेन के प्रभाव से ही मैं इस समय जीवित हूँ। यहाँ अधिक कहने से क्या लाभ? मैं उस अपमान को किसी भी प्रकार सहन नहीं कर सकता। ॥13-14॥
 
O bravest of warriors! He has chased me in the war and insulted me everywhere and has spoken many harsh words - there is no doubt about this. Dhananjaya! I am alive at this moment only because of Bhimasena's influence. What is the use of saying more here? I cannot tolerate that insult in any way. ॥ 13-14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)