श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 64: अर्जुनद्वारा अश्वत्थामाकी पराजय, कौरव-सेनामें भगदड़ एवं दुर्योधनसे प्रेरित कर्णद्वारा भार्गवास्त्रसे पांचालोंका संहार  »  श्लोक 69-70
 
 
श्लोक  8.64.69-70 
गच्छन्नेव तु कौन्तेयो धर्मराजदिदृक्षया।
सैन्यमालोकयामास नापश्यत् तत्र चाग्रजम्॥ ६९॥
युद्धं कृत्वा तु कौन्तेयो द्रोणपुत्रेण भारत।
दु:सहं वज्रिणा संख्ये पराजित्य गुरो: सुतम्॥ ७०॥
 
 
अनुवाद
भारतवर्षकुन्तीकुमार अर्जुन द्रोणपुत्र के साथ युद्ध करके तथा वज्रधारी इन्द्र के शोक से रणभूमि में उस गुरुपुत्र को परास्त करके जाते समय धर्मराज को देखने की इच्छा से सम्पूर्ण सेना की ओर देखते रहे। किन्तु मुझे वहाँ कहीं भी अपना बड़ा भाई दिखाई नहीं दिया। 69-70॥
 
India Kuntikumar Arjun, after fighting with the son of Drona, and after defeating that Guru's son in the battlefield with the sorrow of Indra wielding the thunderbolt, while leaving, he looked at the entire army with the desire to see the king of Dharma. But I did not see my elder brother anywhere there. 69-70॥
 
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि धर्मराजशोधने चतु:षष्टितमोऽध्याय:॥ ६४॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें युधिष्ठिरकी खोजविषयक चौंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ६४॥

 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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