श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 64: अर्जुनद्वारा अश्वत्थामाकी पराजय, कौरव-सेनामें भगदड़ एवं दुर्योधनसे प्रेरित कर्णद्वारा भार्गवास्त्रसे पांचालोंका संहार  »  श्लोक 67
 
 
श्लोक  8.64.67 
एवमुक्त्वा पुन: प्रायाद् द्रष्टुमिच्छन् युधिष्ठिरम्।
श्रमेण ग्राहयिष्यंश्च युद्धे कर्णं विशाम्पते॥ ६७॥
 
 
अनुवाद
प्रजानाथ! ऐसा कहकर वे पुनः युधिष्ठिर से मिलने तथा कर्ण को युद्ध में अधिक थका देने की इच्छा से वहाँ से चले गए॥67॥
 
Prajanath! Saying this, he left from there with the desire to meet Yudhishthira again and to make Karna more tired in the battle. 67॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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