श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 64: अर्जुनद्वारा अश्वत्थामाकी पराजय, कौरव-सेनामें भगदड़ एवं दुर्योधनसे प्रेरित कर्णद्वारा भार्गवास्त्रसे पांचालोंका संहार  »  श्लोक 45-47
 
 
श्लोक  8.64.45-47 
एवमुक्त्वा महाराज सूतपुत्र: प्रतापवान्॥ ४५॥
प्रगृह्य विजयं वीरो धनु: श्रेष्ठं पुरातनम्।
सज्यं कृत्वा महाराज संगृह्य च पुन: पुन:॥ ४६॥
संनिवार्य च योधान् स सत्येन शपथेन च।
प्रायोजयदमेयात्मा भार्गवास्त्रं महाबल:॥ ४७॥
 
 
अनुवाद
महाराज! ऐसा कहकर वीर एवं शूरवीर सारथिपुत्र कर्ण ने अपना उत्तम एवं प्राचीन विजय नामक धनुष लेकर उस पर प्रत्यंचा चढ़ाई, फिर उसे बार-बार हाथ में लेकर सत्य की शपथ दिलाकर समस्त योद्धाओं को रोक दिया। तत्पश्चात् उस महाबली योद्धा ने, जो अत्यन्त आत्मविश्वास से युक्त था, भार्गवास्त्र का प्रयोग किया।
 
Maharaj! Saying this, the valiant and brave charioteer's son Karna took his excellent and ancient bow named Vijay and strung it; then taking it in his hand again and again and making them swear on truth, he stopped all the warriors. After this, that mighty warrior endowed with immense self-confidence used Bhargavastra.
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas