ततोऽर्जुन: सायकानां शतेन
गुरो: सुतं मर्मसु निर्बिभेद।
अश्वांश्च सूतं च तथा धनुर्ज्या-
मवाकिरत् पश्यतां तावकानाम्॥ २७॥
अनुवाद
तत्पश्चात् अर्जुन ने गुरुपुत्र के नाभिस्थानों को सौ बाणों से बींध डाला और आपके पुत्रों के सामने ही उसके घोड़ों, सारथि, धनुष और प्रत्यंचा पर बाणों की वर्षा की।
Thereafter Arjuna pierced the vital spots of the Guru's son with a hundred arrows and in front of your sons he showered arrows on his horses, charioteer, bow and bowstring.