श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 63: कर्णद्वारा नकुल-सहदेवसहित युधिष्ठिरकी पराजय एवं पीड़ित होकर युधिष्ठिरका अपनी छावनीमें जाकर विश्राम करना  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  8.63.35 
अपनीतशल्य: सुभृशं हृच्छल्याभिनिपीडित:।
सोऽब्रवीद्‍भ्रातरौ राजा माद्रीपुत्रौ महारथौ॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
वहाँ उसके शरीर से बाण तो निकल गए, परन्तु फिर भी हृदय में चुभे हुए अपमानरूपी काँटे के कारण उसे बड़ी पीड़ा हो रही थी। उस समय राजा ने माद्री के पुत्र महारथी नकुल और सहदेव दोनों भाइयों से इस प्रकार कहा -॥35॥
 
There the arrows were removed from his body, but still he was in great pain due to the thorn of insult that had pierced his heart. At that time the king spoke to both the brothers, the great warriors Nakula and Sahadeva, the sons of Madri, in this manner -॥ 35॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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