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mahabharat 8.62.25-26: हे भरतश्रेष्ठ! धर्मात्मा युधिष्ठिर ने कंक आदि नाना प्रकार के पत्तों से युक्त तीखे बाणों द्वारा, नाना प्रकार के भालों द्वारा, भालों, ऋषि और मूसलों द्वारा शिला पर प्रहार करके, जहाँ-जहाँ आपके सैनिक टुकड़े-टुकड़े होकर बिखर गए थे, वहाँ-वहाँ क्रोध से भरी दृष्टि डाली।॥25-26॥   |   mahabharat अध्याय 8.62: युधिष्ठिरपर कौरव-सैनिकोंका आक्रमण   ।   mahabharat पर्व 8: कर्ण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 62: युधिष्ठिरपर कौरव-सैनिकोंका आक्रमण  »  श्लोक 25-26
 
 
श्लोक  8.62.25-26 
सायकैर्विविधैस्तीक्ष्णै: कङ्कपत्रै: शिलाशितै:।
भल्लैरनेकैर्विविधै: शक्त्यृष्टिमुसलैरपि॥ २५॥
यत्र यत्र स धर्मात्मा दुष्टां दृष्टं व्यसर्जयत्।
तत्र तत्र व्यशीर्यन्त तावका भरतर्षभ॥ २६॥
 
 
अनुवाद
हे भरतश्रेष्ठ! धर्मात्मा युधिष्ठिर ने कंक आदि नाना प्रकार के पत्तों से युक्त तीखे बाणों द्वारा, नाना प्रकार के भालों द्वारा, भालों, ऋषि और मूसलों द्वारा शिला पर प्रहार करके, जहाँ-जहाँ आपके सैनिक टुकड़े-टुकड़े होकर बिखर गए थे, वहाँ-वहाँ क्रोध से भरी दृष्टि डाली।॥25-26॥
 
O best of the Bharatas! The righteous Yudhishthira, attacking the rock with sharp arrows having leaves of Kanka and various kinds, with numerous spears of various kinds, as well as with spears, Rishti and pestles, cast his gaze filled with anger, wherever your soldiers were torn to pieces and scattered.॥25-26॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)