श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 61: कर्णद्वारा शिखण्डीकी पराजय, धृष्टद्युम्न और दु:शासनका तथा वृषसेन और नकुलका युद्ध, सहदेवद्वारा उलूककी तथा सात्यकिद्वारा शकुनिकी पराजय, कृपाचार्यद्वारा युधामन्युकी एवं कृतवर्माद्वारा उत्तमौजाकी पराजय तथा भीमसेनद्वारा दुर्योधनकी पराजय, गजसेनाका संहार और पलायन  »  श्लोक 69-70h
 
 
श्लोक  8.61.69-70h 
दीप्ताभै रत्नवद्भिश्च पतितैर्गजयोधिभि:॥ ६९॥
रराज भूमि: पतितै: क्षीणपुण्यैरिव ग्रहै:।
 
 
अनुवाद
वह भूमि दीप्तिमान आभा और रत्नजटित आभूषण धारण किये हुए गिरे हुए हाथी सवारों से ऐसी शोभा पा रही थी, मानो स्वर्ग के ग्रह अपने पुण्यों के क्षीण हो जाने पर पृथ्वी पर गिर पड़े हों।
 
The land was looking as beautiful with the radiant glow and the fallen elephant riders wearing jeweled ornaments, as if the planets of the heaven had fallen on the earth after their virtues were exhausted. 69 1/2
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)