श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 56: नकुल-सहदेवके साथ दुर्योधनका युद्ध, धृष्टद्युम्नसे दुर्योधनकी पराजय, कर्णद्वारा पांचाल-सेनासहित योद्धाओंका संहार, भीमसेनद्वारा कौरव योद्धाओंका सेनासहित विनाश, अर्जुनद्वारा संशप्तकोंका वध तथा अश्वत्थामाका अर्जुनके साथ घोर युद्ध करके पराजित होना  »  श्लोक 43-44h
 
 
श्लोक  8.56.43-44h 
तांस्तथाधिरथि: क्रुद्धो यतमानान् मनस्विन:॥ ४३॥
विचिन्वन्निव बाणौघै: समासादयदग्रगान्।
 
 
अनुवाद
क्रोधित होकर अधिरथपुत्र कर्ण ने विजय के लिए प्रयत्न करने वाले, दृढ़ निश्चयी तथा आगे चलने वाले वीरों को चुन-चुनकर बाणों से मारना आरम्भ किया। ॥43 1/2॥
 
Enraged, Karna, the son of Adhiratha, began to selectively kill with arrows the brave men who were striving for victory and were strong-willed and were leading the way. ॥ 43 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)