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श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 56: नकुल-सहदेवके साथ दुर्योधनका युद्ध, धृष्टद्युम्नसे दुर्योधनकी पराजय, कर्णद्वारा पांचाल-सेनासहित योद्धाओंका संहार, भीमसेनद्वारा कौरव योद्धाओंका सेनासहित विनाश, अर्जुनद्वारा संशप्तकोंका वध तथा अश्वत्थामाका अर्जुनके साथ घोर युद्ध करके पराजित होना  »  श्लोक 30-31h
 
 
श्लोक  8.56.30-31h 
तस्य तेऽशोभयन् वक्त्रं कर्मारपरिमार्जिता:॥ ३०॥
प्रफुल्लं पङ्कजं यद्वद् भ्रमरा मधुलिप्सव:।
 
 
अनुवाद
कारीगरों द्वारा साफ किए गए उन बाणों ने धृष्टद्युम्न के मुख की शोभा इस प्रकार बढ़ा दी, मानो कोई मधु-लोलुप मधुमक्खी खिले हुए कमल पुष्प का रसपान कर रही हो।
 
Those arrows, cleaned by the artisans, enhanced the beauty of Dhrishtadyumna's face as if a honey-greedy bee were enjoying the nectar of a blooming lotus flower. 30 1/2
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)