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mahabharat 8.56.25-26h: भरतश्रेष्ठ धृष्टद्युम्न को मारने की इच्छा से दुर्योधन ने उन पर फुंफकारते हुए सर्पों के समान पंद्रह नाराच छोड़े ॥25 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 8.56: नकुल-सहदेवके साथ दुर्योधनका युद्ध, धृष्टद्युम्नसे दुर्योधनकी पराजय, कर्णद्वारा पांचाल-सेनासहित योद्धाओंका संहार, भीमसेनद्वारा कौरव योद्धाओंका सेनासहित विनाश, अर्जुनद्वारा संशप्तकोंका वध तथा अश्वत्थामाका अर्जुनके साथ घोर युद्ध करके पराजित होना   ।   mahabharat पर्व 8: कर्ण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 56: नकुल-सहदेवके साथ दुर्योधनका युद्ध, धृष्टद्युम्नसे दुर्योधनकी पराजय, कर्णद्वारा पांचाल-सेनासहित योद्धाओंका संहार, भीमसेनद्वारा कौरव योद्धाओंका सेनासहित विनाश, अर्जुनद्वारा संशप्तकोंका वध तथा अश्वत्थामाका अर्जुनके साथ घोर युद्ध करके पराजित होना  »  श्लोक 25-26h
 
 
श्लोक  8.56.25-26h 
स पञ्चदश नाराचाञ्श्वसत: पन्नगानिव॥ २५॥
जिघांसुर्भरतश्रेष्ठं धृष्टद्युम्नो व्यपासृजत्।
 
 
अनुवाद
भरतश्रेष्ठ धृष्टद्युम्न को मारने की इच्छा से दुर्योधन ने उन पर फुंफकारते हुए सर्पों के समान पंद्रह नाराच छोड़े ॥25 1/2॥
 
Dhrishtadyumna, desiring to kill the best of Bharat, Duryodhana, hissing at him, released fifteen Narach like snakes. 25 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)