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mahabharat 8.56.105: वहाँ सब लोग ऐसा मानने लगे कि 'अर्जुन के हाथ की ध्वनि से पृथ्वी, आकाश, सम्पूर्ण दिशाएँ, समुद्र और पर्वत भी फट रहे हैं ॥105॥   |   mahabharat अध्याय 8.56: नकुल-सहदेवके साथ दुर्योधनका युद्ध, धृष्टद्युम्नसे दुर्योधनकी पराजय, कर्णद्वारा पांचाल-सेनासहित योद्धाओंका संहार, भीमसेनद्वारा कौरव योद्धाओंका सेनासहित विनाश, अर्जुनद्वारा संशप्तकोंका वध तथा अश्वत्थामाका अर्जुनके साथ घोर युद्ध करके पराजित होना   ।   mahabharat पर्व 8: कर्ण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 56: नकुल-सहदेवके साथ दुर्योधनका युद्ध, धृष्टद्युम्नसे दुर्योधनकी पराजय, कर्णद्वारा पांचाल-सेनासहित योद्धाओंका संहार, भीमसेनद्वारा कौरव योद्धाओंका सेनासहित विनाश, अर्जुनद्वारा संशप्तकोंका वध तथा अश्वत्थामाका अर्जुनके साथ घोर युद्ध करके पराजित होना  »  श्लोक 105
 
 
श्लोक  8.56.105 
मही वियद् दिश: सर्वा: समुद्रा गिरयोऽपि वा।
स्फुटन्तीति जना जज्ञु: पार्थस्य तलनि:स्वनात्॥ १०५॥
 
 
अनुवाद
वहाँ सब लोग ऐसा मानने लगे कि 'अर्जुन के हाथ की ध्वनि से पृथ्वी, आकाश, सम्पूर्ण दिशाएँ, समुद्र और पर्वत भी फट रहे हैं ॥105॥
 
Everybody there began to believe that 'due to the sound of Arjun's palms the earth, the sky, all directions, the oceans and even the mountains are being torn apart.'॥ 105॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)