श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 55: अश्वत्थामाका घोर युद्ध, सात्यकिके सारथिका वध एवं युधिष्ठिरका अश्वत्थामाको छोड़कर दूसरी ओर चले जाना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  8.55.5 
बाणजालं दिविच्छन्नं स्वर्णजालविभूषितम्।
शुशुभे भरतश्रेष्ठ वितानमिव धिष्ठितम्॥ ५॥
 
 
अनुवाद
भरतश्रेष्ठ! सुवर्णमय जाल से सुशोभित वह बाणों का जाल आकाश में फैला हुआ था और वहाँ छत्र बिछा हुआ था, उसके समान शोभा पा रहा था॥5॥
 
Bharatshrestha! That net of arrows adorned with a golden net spread across the sky and looked beautiful like a canopy stretched there. 5॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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