श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 55: अश्वत्थामाका घोर युद्ध, सात्यकिके सारथिका वध एवं युधिष्ठिरका अश्वत्थामाको छोड़कर दूसरी ओर चले जाना  »  श्लोक 32-33h
 
 
श्लोक  8.55.32-33h 
नैव नाम तव प्रीतिर्नैव नाम कृतज्ञता॥ ३२॥
यतस्त्वं पुरुषव्याघ्र मामेवाद्य जिघांससि।
 
 
अनुवाद
पुरुषसिंह! तुम आज मुझे मार डालना चाहते हो, यह न तुम्हारा प्रेम है, न कृतज्ञता। 32 1/2
 
Purushsingh! You want to kill me today, this is neither your love nor gratitude. 32 1/2
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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