श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 55: अश्वत्थामाका घोर युद्ध, सात्यकिके सारथिका वध एवं युधिष्ठिरका अश्वत्थामाको छोड़कर दूसरी ओर चले जाना  »  श्लोक 28-29h
 
 
श्लोक  8.55.28-29h 
तत: शरशतज्वाल: सेनाकक्षं महारथ:॥ २८॥
द्रौणिर्ददाह समरे कक्षमग्निर्यथा वने।
 
 
अनुवाद
जैसे अग्नि वन में सूखी लकड़ी और घास को जला देती है, उसी प्रकार महाबली अश्वत्थामा सैकड़ों बाणों की ज्वालाओं से प्रज्वलित होकर युद्धस्थल में पाण्डव सेना की सूखी लकड़ी और घास को जलाने लगे॥28 1/2॥
 
Just as fire burns up the dry wood and grass in a forest, similarly the mighty warrior Ashvatthama, blazing with the flames of hundreds of arrows, began burning up the dry wood and grass of the Pandava army in the battle-field.॥28 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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