|
| |
| |
श्लोक 8.53.46-d1  |
तत्र युद्धं महच्चासीत् तावकानां विशाम्पते।
शूरेण बलिना सार्धं पाण्डवेन किरीटिना॥ ४६॥
(जित्वा तान् न्यहनत् पार्थ: शत्रूञ्शक्र इवासुरान्॥ ) |
| |
| |
| अनुवाद |
| प्रजानाथ! तत्पश्चात् आपके सैनिकों और किरीटधारी एवं पराक्रमी पाण्डुपुत्र अर्जुन के बीच घोर युद्ध हुआ। उसमें कुन्तीपुत्र अर्जुन ने उन शत्रुओं को परास्त करके उनका उसी प्रकार संहार किया, जैसे देवराज इन्द्र ने दैत्यों का संहार किया था। |
| |
| Prajanath! Then there was a huge battle between your soldiers and the crowned and valiant warrior Arjuna, son of Pandu. In that, Arjuna, son of Kunti, defeated those enemies and killed them in the same way as Devraja Indra had killed the demons. |
| |
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि संकुलयुद्धे त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्याय:॥ ५३॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें संकुलयुद्धविषयक तिरपनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ५३॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/२ श्लोक मिलाकर कुल ४६ १/२ श्लोक हैं) |
| |
| ✨ ai-generated |
| |
|