Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 8.53.43-44h: सारी सेना निश्चल हो गई थी। वह कोई पराक्रम दिखाने में असमर्थ थी और उसी अवस्था में मारी जा रही थी। मैंने यह सब अपनी आँखों से देखा। महाराज! पाण्डुपुत्र अर्जुन युद्धभूमि में दस हज़ार योद्धाओं का वध करके धूम्ररहित अग्नि के समान चमक रहे थे।   |   mahabharat अध्याय 8.53: अर्जुनद्वारा दस हजार संशप्तक योद्धाओं और उनकी सेनाका संहार   ।   mahabharat पर्व 8: कर्ण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 53: अर्जुनद्वारा दस हजार संशप्तक योद्धाओं और उनकी सेनाका संहार  »  श्लोक 43-44h
 
 
श्लोक  8.53.43-44h 
हन्यमानमपश्यंश्च निश्चेष्टं स्म पराक्रमे।
अयुतं तत्र योधानां हत्वा पाण्डुसुतो रणे॥ ४३॥
व्यभ्राजत महाराज विधूमोऽग्निरिव ज्वलन्।
 
 
अनुवाद
सारी सेना निश्चल हो गई थी। वह कोई पराक्रम दिखाने में असमर्थ थी और उसी अवस्था में मारी जा रही थी। मैंने यह सब अपनी आँखों से देखा। महाराज! पाण्डुपुत्र अर्जुन युद्धभूमि में दस हज़ार योद्धाओं का वध करके धूम्ररहित अग्नि के समान चमक रहे थे।
 
The entire army had become motionless. It was unable to show any bravery and was being killed in that condition. I saw all this with my own eyes. Maharaj! Arjun, son of Pandu, was shining like a smokeless fire after killing ten thousand warriors on the battlefield. 43 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)