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mahabharat 8.52.13-14: हे मनुष्यों! हाथी आपस में लड़ रहे थे और एक-दूसरे को दाँतों से पीड़ा पहुँचा रहे थे। दाँतों की चोट से रक्त से लथपथ शरीर वाले हाथी, धातु-जटित पर्वतों के समान शोभायमान हो रहे थे, जिनमें गेरू-मिश्रित जल के झरने बह रहे थे।   |   mahabharat अध्याय 8.52: दोनों सेनाओंका घोर युद्ध और कौरव-सेनाका व्यथित होना   ।   mahabharat पर्व 8: कर्ण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 52: दोनों सेनाओंका घोर युद्ध और कौरव-सेनाका व्यथित होना  »  श्लोक 13-14
 
 
श्लोक  8.52.13-14 
गजा गजान् समासाद्य विषाणैरार्दयन् नृप।
विषाणाभिहतास्तत्र भ्राजन्ते द्विरदास्तथा॥ १३॥
रुधिरेणावसिक्ताङ्गा गैरिकप्रस्रवा इव।
यथा भ्राजन्ति स्यन्दन्त: पर्वता धातुमण्डिता:॥ १४॥
 
 
अनुवाद
हे मनुष्यों! हाथी आपस में लड़ रहे थे और एक-दूसरे को दाँतों से पीड़ा पहुँचा रहे थे। दाँतों की चोट से रक्त से लथपथ शरीर वाले हाथी, धातु-जटित पर्वतों के समान शोभायमान हो रहे थे, जिनमें गेरू-मिश्रित जल के झरने बह रहे थे।
 
Lord of men! The elephants were fighting with each other and inflicting pain on each other with their teeth. The elephants, with their bodies soaked in blood due to the blows of their teeth, looked beautiful like metal-adorned mountains with springs flowing with water mixed with the colour of ochre.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)