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mahabharat 8.50.24-25: मेरे मन में बहुत दिनों से यह इच्छा हो रही है कि मैं युद्धभूमि में अर्जुन को मार डालूँ अथवा वह मुझे मार डाले। कदाचित् आज ही भीमसेन से मिलकर मेरी यह इच्छा पूर्ण हो जाए॥ 24-25॥   |   mahabharat अध्याय 8.50: कर्ण और भीमसेनका युद्ध तथा कर्णका पलायन   ।   mahabharat पर्व 8: कर्ण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 50: कर्ण और भीमसेनका युद्ध तथा कर्णका पलायन  »  श्लोक 24-25
 
 
श्लोक  8.50.24-25 
चिरकालाभिलषितो मामयं तु मनोरथ:॥ २४॥
अर्जुनं समरे हन्यां मां वा हन्याद् धनंजय:।
स मे कदाचिदद्यैव भवेद् भीमसमागमात्॥ २५॥
 
 
अनुवाद
मेरे मन में बहुत दिनों से यह इच्छा हो रही है कि मैं युद्धभूमि में अर्जुन को मार डालूँ अथवा वह मुझे मार डाले। कदाचित् आज ही भीमसेन से मिलकर मेरी यह इच्छा पूर्ण हो जाए॥ 24-25॥
 
‘It has been a desire in my heart for a long time that I should kill Arjuna in the battlefield or he should kill me. Perhaps by meeting Bhimasena, my desire may be fulfilled today itself.॥ 24-25॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)