श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 49: कर्ण और युधिष्ठिरका संग्राम, कर्णकी मूर्च्छा, कर्णद्वारा युधिष्ठिरकी पराजय और तिरस्कार तथा पाण्डवोंके हजारों योद्धाओंका वध और रक्त-नदीका वर्णन तथा पाण्डव महारथियोंद्वारा कौरव-सेनाका विध्वंस और उसका पलायन  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  8.49.42 
तद् वर्म हेमविकृतं रत्नचित्रं बभौ पतत्।
सविद्युदभ्रं सवितु: श्लिष्टं वातहतं यथा॥ ४२॥
 
 
अनुवाद
उसका स्वर्णमय और रत्नजटित कवच गिरते समय ऐसा शोभायमान हो रहा था, मानो सूर्य के समीप स्थित बिजली से चमकता हुआ बादल वायु के आघात से गिर रहा हो ॥42॥
 
His golden and jeweled armour looked as beautiful as when it fell, as if a cloud with lightning, close to the Sun, was falling down after being struck by the wind. ॥ 42॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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