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श्लोक 8.48.67  |
तत: पुन: समाजग्मुरभीता: कुरुपाण्डवा:।
युधिष्ठिरमुखा: पार्था: सूतपुत्रमुखा वयम्॥ ६७॥ |
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| अनुवाद |
| तत्पश्चात् कौरव और पांडव योद्धा पुनः निर्भय होकर एक-दूसरे से लड़ने लगे। एक ओर युधिष्ठिर और कुंतीपुत्र थे, और दूसरी ओर कर्ण और हम लोग थे। |
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| Thereafter the Kaurava and Pandava warriors once again fearlessly fought with each other. On one side were Yudhishthira and the sons of Kunti and on the other side were Karna and we. |
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इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि संकुलयुद्धे अष्टचत्वारिंशोऽध्याय:॥ ४८॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें संकुलयुद्धविषयक अड़तालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ४८॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ५ १/२ श्लोक मिलाकर कुल ७२ १/२ श्लोक हैं) |
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