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mahabharat 8.45.5: ‘महाराज! नाना धर्मावलम्बी देशों में भ्रमण करते हुए जब मैं परदेश में आया, तो वहाँ ऐसी बातें देखीं और सुनीं ॥5॥   |   mahabharat अध्याय 8.45: कर्णका मद्र आदि बाहीक-निवासियोंके दोष बताना, शल्यका उत्तर देना और दुर्योधनका दोनोंको शान्त करना   ।   mahabharat पर्व 8: कर्ण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 45: कर्णका मद्र आदि बाहीक-निवासियोंके दोष बताना, शल्यका उत्तर देना और दुर्योधनका दोनोंको शान्त करना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  8.45.5 
अटता तु ततो देशान् नानाधर्मसमाकुलान्।
आगच्छता महाराज वाहीकेषु निशामितम्॥ ५॥
 
 
अनुवाद
‘महाराज! नाना धर्मावलम्बी देशों में भ्रमण करते हुए जब मैं परदेश में आया, तो वहाँ ऐसी बातें देखीं और सुनीं ॥5॥
 
‘Maharaj! While roaming in various countries with different religions, when I was coming to a foreign country, I saw and heard such things there. ॥ 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)