vedamrit
Reset
Home
ग्रन्थ
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण
श्रीमद् भगवद गीता
______________
श्री विष्णु पुराण
श्रीमद् भागवतम
______________
श्रीचैतन्य भागवत
वैष्णव भजन
About
Contact
श्री महाभारत
»
पर्व 8: कर्ण पर्व
»
अध्याय 45: कर्णका मद्र आदि बाहीक-निवासियोंके दोष बताना, शल्यका उत्तर देना और दुर्योधनका दोनोंको शान्त करना
»
श्लोक 5
श्लोक
8.45.5
अटता तु ततो देशान् नानाधर्मसमाकुलान्।
आगच्छता महाराज वाहीकेषु निशामितम्॥ ५॥
अनुवाद
‘महाराज! नाना धर्मावलम्बी देशों में भ्रमण करते हुए जब मैं परदेश में आया, तो वहाँ ऐसी बातें देखीं और सुनीं ॥5॥
‘Maharaj! While roaming in various countries with different religions, when I was coming to a foreign country, I saw and heard such things there. ॥ 5॥
✨ ai-generated
Connect Form
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas