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श्लोक 8.45.48  |
ततो निवारित: कर्णो धार्तराष्ट्रेण मारिष।
कर्णोऽपि नोत्तरं प्राह शल्योऽप्यभिमुख: परान्।
तत: प्रहस्य राधेय: पुनर्याहीत्यचोदयत्॥ ४८॥ |
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| अनुवाद |
| माननीय महाराज! दुर्योधन के मना करने पर भी कर्ण ने कोई उत्तर नहीं दिया और शल्य ने भी शत्रुओं की ओर मुख कर लिया। तब राधापुत्र कर्ण ने मुस्कुराकर शल्य को रथ आगे बढ़ाने का आदेश दिया और कहा - 'चलो, चलो'॥48॥ |
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| Honorable Sir! Karna did not reply to Duryodhan's refusal and Shalya also turned his face towards the enemies. Then Radha's son Karna smiled and ordered Shalya to move the chariot forward and said - 'Come on, come on'॥ 48॥ |
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इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि कर्णशल्यसंवादे पञ्चचत्वारिंशोऽध्याय:॥ ४५॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें कर्ण और शल्यका संवादविषयक पैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ४५॥
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