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mahabharat 8.45.33-34h: महाराज! दैत्य, पिशाच और गुह्यक - ये गिरिराज हिमालय और गन्धमादन पर्वत की रक्षा करते हैं तथा अविनाशी एवं सर्वव्यापी भगवान जनार्दन सम्पूर्ण प्राणियों का पालन करते हैं (किन्तु बाहीक देश पर किसी देवता की विशेष कृपा नहीं है)। 33 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 8.45: कर्णका मद्र आदि बाहीक-निवासियोंके दोष बताना, शल्यका उत्तर देना और दुर्योधनका दोनोंको शान्त करना   ।   mahabharat पर्व 8: कर्ण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 45: कर्णका मद्र आदि बाहीक-निवासियोंके दोष बताना, शल्यका उत्तर देना और दुर्योधनका दोनोंको शान्त करना  »  श्लोक 33-34h
 
 
श्लोक  8.45.33-34h 
तथा रक्ष:पिशाचाश्च हिमवन्तं नगोत्तमम्।
गुह्यकाश्च महाराज पर्वतं गन्धमादनम्॥ ३३॥
ध्रुव: सर्वाणि भूतानि विष्णु: पाति जनार्दन:।
 
 
अनुवाद
महाराज! दैत्य, पिशाच और गुह्यक - ये गिरिराज हिमालय और गन्धमादन पर्वत की रक्षा करते हैं तथा अविनाशी एवं सर्वव्यापी भगवान जनार्दन सम्पूर्ण प्राणियों का पालन करते हैं (किन्तु बाहीक देश पर किसी देवता की विशेष कृपा नहीं है)। 33 1/2॥
 
Maharaj! Demons, vampires and Guhyaks - these Girirajs protect the Himalayas and Gandhamadan mountain and the immortal and omnipresent Lord Janardan takes care of all the living beings (but there is no special favor of any god on the Bahik country). 33 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)