श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 45: कर्णका मद्र आदि बाहीक-निवासियोंके दोष बताना, शल्यका उत्तर देना और दुर्योधनका दोनोंको शान्त करना  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  8.45.3 
मया हिमवत: शृङ्गमेकेनाध्युषितं चिरम्।
दृष्टाश्च बहवो देशा नानाधर्मसमावृता:॥ ३॥
 
 
अनुवाद
‘मैं हिमालय के शिखर पर बहुत समय तक अकेला रहा हूँ और मैंने अनेक धर्मों वाले अनेक देश देखे हैं।॥3॥
 
‘I have lived alone for a long time on the peak of the Himalayas and have seen many countries with different religions.॥ 3॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)