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mahabharat 8.45.20: जब सत्ययुग में ब्रह्माजी ने पंचनद वासियों के धर्म की निन्दा की थी, जो कर्मकाण्ड से रहित, दुष्ट और पापी थे, तब आप उसी देश के निवासी होकर संसार में धर्म का उपदेश क्यों करने जा रहे हैं?॥20॥   |   mahabharat अध्याय 8.45: कर्णका मद्र आदि बाहीक-निवासियोंके दोष बताना, शल्यका उत्तर देना और दुर्योधनका दोनोंको शान्त करना   ।   mahabharat पर्व 8: कर्ण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 45: कर्णका मद्र आदि बाहीक-निवासियोंके दोष बताना, शल्यका उत्तर देना और दुर्योधनका दोनोंको शान्त करना  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  8.45.20 
व्रात्यानां दासमीयानां कृतेऽप्यशुभकर्मणाम्।
ब्रह्मणा निन्दिते धर्मे स त्वं लोके किमब्रवी:॥ २०॥
 
 
अनुवाद
जब सत्ययुग में ब्रह्माजी ने पंचनद वासियों के धर्म की निन्दा की थी, जो कर्मकाण्ड से रहित, दुष्ट और पापी थे, तब आप उसी देश के निवासी होकर संसार में धर्म का उपदेश क्यों करने जा रहे हैं?॥20॥
 
When in Satyayuga, Brahmaji criticized the religion of the Panchanad residents who were devoid of rituals, were wicked and sinful, then why are you, being a resident of the same land, going to preach religion in the world?॥20॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)