Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 8.43.9: इसके अतिरिक्त, मैंने पहले ही एक शर्त रख दी है कि मैं तुम्हारे अप्रिय वचनों को क्षमा कर दूँगा। यदि हजारों शल्य भी न हों, तो भी मैं शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर सकता हूँ; किन्तु मित्र के साथ विश्वासघात करना महापाप है, इसीलिए तुम अभी तक जीवित हो।'   |   mahabharat अध्याय 8.43: कर्णका आत्मप्रशंसापूर्वक शल्यको फटकारना   ।   mahabharat पर्व 8: कर्ण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 43: कर्णका आत्मप्रशंसापूर्वक शल्यको फटकारना  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  8.43.9 
कृतश्च समय: पूर्वं क्षन्तव्यं विप्रियं तव।
ऋते शल्यसहस्रेण विजयेयमहं परान्।
मित्रद्रोहस्तु पापीयानिति जीवसि साम्प्रतम्॥ ९॥
 
 
अनुवाद
इसके अतिरिक्त, मैंने पहले ही एक शर्त रख दी है कि मैं तुम्हारे अप्रिय वचनों को क्षमा कर दूँगा। यदि हजारों शल्य भी न हों, तो भी मैं शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर सकता हूँ; किन्तु मित्र के साथ विश्वासघात करना महापाप है, इसीलिए तुम अभी तक जीवित हो।'
 
Apart from this, I have already made a condition that I will forgive your unpleasant words. Even if thousands of Shalyas are not there, I can still win over the enemies; but betraying a friend is a great sin, that is why you are still alive.'
 
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि कर्णशल्यसंवादे त्रिचत्वारिंशोऽध्याय:॥ ४३॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें कर्ण और शल्यका संवादविषयक तैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ४३॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)