श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 42: कर्णका श्रीकृष्ण और अर्जुनके प्रभावको स्वीकार करते हुए अभिमानपूर्वक शल्यको फटकारना और उनसे अपनेको परशुरामजीद्वारा और ब्राह्मणद्वारा प्राप्त हुए शापोंकी कथा सुनाना  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  8.42.7 
स धैर्ययुक्तं प्रसमीक्ष्य मां वै
न त्वं विप्र: कोऽसि सत्यं वदेति।
तस्मै तदाऽऽत्मानमहं यथाव-
दाख्यातवान् सूत इत्येव शल्य॥ ७॥
 
 
अनुवाद
शल्य! मुझे इतना धैर्यवान देखकर उन्होंने पूछा- ‘अरे! तुम ब्राह्मण नहीं हो, फिर कौन हो? सच-सच बताओ।’ तब मैंने उन्हें अपना असली परिचय देते हुए कहा- ‘भगवन्! मैं सूत हूँ।’
 
Shalya! Seeing me so patient, he asked- 'Oh! You are not a Brahmin; then who are you? Tell me the truth.' Then I gave him my true identity and said- 'Lord! I am a Suta'.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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