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श्लोक 8.42.7  |
स धैर्ययुक्तं प्रसमीक्ष्य मां वै
न त्वं विप्र: कोऽसि सत्यं वदेति।
तस्मै तदाऽऽत्मानमहं यथाव-
दाख्यातवान् सूत इत्येव शल्य॥ ७॥ |
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| अनुवाद |
| शल्य! मुझे इतना धैर्यवान देखकर उन्होंने पूछा- ‘अरे! तुम ब्राह्मण नहीं हो, फिर कौन हो? सच-सच बताओ।’ तब मैंने उन्हें अपना असली परिचय देते हुए कहा- ‘भगवन्! मैं सूत हूँ।’ |
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| Shalya! Seeing me so patient, he asked- 'Oh! You are not a Brahmin; then who are you? Tell me the truth.' Then I gave him my true identity and said- 'Lord! I am a Suta'. |
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