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mahabharat 8.42.6: मेरी जांघ में घाव होने के कारण मेरे शरीर से गाढ़ा रक्त बहने लगा; परन्तु गुरु के जाग जाने के भय से मैं तनिक भी विचलित नहीं हुआ। बाद में जब गुरुजी की नींद खुली, तो उन्होंने यह सब देखा॥6॥   |   mahabharat अध्याय 8.42: कर्णका श्रीकृष्ण और अर्जुनके प्रभावको स्वीकार करते हुए अभिमानपूर्वक शल्यको फटकारना और उनसे अपनेको परशुरामजीद्वारा और ब्राह्मणद्वारा प्राप्त हुए शापोंकी कथा सुनाना   ।   mahabharat पर्व 8: कर्ण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 42: कर्णका श्रीकृष्ण और अर्जुनके प्रभावको स्वीकार करते हुए अभिमानपूर्वक शल्यको फटकारना और उनसे अपनेको परशुरामजीद्वारा और ब्राह्मणद्वारा प्राप्त हुए शापोंकी कथा सुनाना  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  8.42.6 
ऊरुप्रभेदाच्च महान् बभूव
शरीरतो मे घनशोणितौघ:।
गुरोर्भयाच्चापि न चेलिवानहं
ततो विबुद्धो ददृशे स विप्र:॥ ६॥
 
 
अनुवाद
मेरी जांघ में घाव होने के कारण मेरे शरीर से गाढ़ा रक्त बहने लगा; परन्तु गुरु के जाग जाने के भय से मैं तनिक भी विचलित नहीं हुआ। बाद में जब गुरुजी की नींद खुली, तो उन्होंने यह सब देखा॥6॥
 
‘Due to the wound in my thigh, a great flow of thick blood started flowing from my body; but I was not disturbed at all for fear of my Guru waking up. Later, when Guruji woke up, he saw all this.॥ 6॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)