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श्लोक 8.42.6  |
ऊरुप्रभेदाच्च महान् बभूव
शरीरतो मे घनशोणितौघ:।
गुरोर्भयाच्चापि न चेलिवानहं
ततो विबुद्धो ददृशे स विप्र:॥ ६॥ |
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| अनुवाद |
| मेरी जांघ में घाव होने के कारण मेरे शरीर से गाढ़ा रक्त बहने लगा; परन्तु गुरु के जाग जाने के भय से मैं तनिक भी विचलित नहीं हुआ। बाद में जब गुरुजी की नींद खुली, तो उन्होंने यह सब देखा॥6॥ |
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| ‘Due to the wound in my thigh, a great flow of thick blood started flowing from my body; but I was not disturbed at all for fear of my Guru waking up. Later, when Guruji woke up, he saw all this.॥ 6॥ |
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