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श्लोक 8.42.50  |
इत्येतत्ते मया प्रोक्तं क्षिप्तेनापि सुहृत्तया।
जानामि त्वां विक्षिपन्तं जोषमास्स्वोत्तरं शृणु॥ ५०॥ |
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| अनुवाद |
| ‘मद्रराज! यद्यपि तुमने मुझ पर आरोप लगाए हैं, फिर भी मित्र होने के नाते मैंने ये सब बातें तुमसे कही हैं। मैं जानता हूँ, अब भी तुम निन्दा करना न छोड़ोगे, फिर भी मैं तुमसे कहता हूँ कि अब से जो कुछ मैं कहूँ, उसे चुपचाप बैठकर सुनो।’॥50॥ |
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| ‘Madraraj! Although you have made accusations against me, yet being a friend I have told you all these things. I know, even now you will not stop criticizing, still I tell you that sit quietly and listen to whatever I say from now on.'॥ 50॥ |
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इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि कर्णशल्यसंवादे द्विचत्वारिंशोऽध्याय:॥ ४२॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें कर्ण और शल्यका संवादविषयक बयालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ४२॥
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