‘मद्रराज! यद्यपि तुमने मुझ पर आरोप लगाए हैं, फिर भी मित्र होने के नाते मैंने ये सब बातें तुमसे कही हैं। मैं जानता हूँ, अब भी तुम निन्दा करना न छोड़ोगे, फिर भी मैं तुमसे कहता हूँ कि अब से जो कुछ मैं कहूँ, उसे चुपचाप बैठकर सुनो।’॥50॥
‘Madraraj! Although you have made accusations against me, yet being a friend I have told you all these things. I know, even now you will not stop criticizing, still I tell you that sit quietly and listen to whatever I say from now on.'॥ 50॥
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि कर्णशल्यसंवादे द्विचत्वारिंशोऽध्याय:॥ ४२॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें कर्ण और शल्यका संवादविषयक बयालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ४२॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥