श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 42: कर्णका श्रीकृष्ण और अर्जुनके प्रभावको स्वीकार करते हुए अभिमानपूर्वक शल्यको फटकारना और उनसे अपनेको परशुरामजीद्वारा और ब्राह्मणद्वारा प्राप्त हुए शापोंकी कथा सुनाना  »  श्लोक 4-5
 
 
श्लोक  8.42.4-5 
अवसं वै ब्राह्मणच्छद्मनाहं
रामे पुरा दिव्यमस्त्रं चिकीर्षु:।
तत्रापि मे देवराजेन विघ्नो
हितार्थिना फाल्गुनस्यैव शल्य॥ ४॥
कृतो विभेदेन ममोरुमेत्य
प्रविश्य कीटस्य तनुं विरूपाम्।
ममोरुमेत्य प्रबिभेद कीट:
सुप्ते गुरौ तत्र शिरो निधाय॥ ५॥
 
 
अनुवाद
पूर्वकाल की कथा है, मैं दिव्यास्त्रों की प्राप्ति की इच्छा से ब्राह्मण वेश में परशुरामजी के यहाँ रहता था। हे शल्य! वहाँ भी अर्जुन का हित चाहने वाले देवराज इन्द्र ने मेरे कार्य में विघ्न उत्पन्न किया। एक दिन गुरुदेव मेरी जाँघ पर सिर रखकर सो रहे थे। उस समय इन्द्र एक भयानक कीड़े के शरीर में प्रविष्ट होकर मेरी जाँघ के पास आए और उसे डस लिया, जिससे उस पर बहुत बड़ा घाव हो गया और इस कृत्य से उन्होंने मेरी इस इच्छा में विघ्न उत्पन्न किया।॥4-5॥
 
‘It is a story of the past, I used to live with Parashurama ji in the guise of a Brahmin with the desire to obtain divine weapons. O Shalya! There also Devraj Indra, who wanted the welfare of Arjuna, created obstacles in my work. One day Gurudev slept with his head on my thigh. At that time Indra entered the body of a terrifying insect and came near my thigh and bit it, inflicting a huge wound on it and by this act he created obstacles in my desire.॥ 4-5॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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