श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 42: कर्णका श्रीकृष्ण और अर्जुनके प्रभावको स्वीकार करते हुए अभिमानपूर्वक शल्यको फटकारना और उनसे अपनेको परशुरामजीद्वारा और ब्राह्मणद्वारा प्राप्त हुए शापोंकी कथा सुनाना  »  श्लोक 38-39
 
 
श्लोक  8.42.38-39 
कदाचिद् विजयस्याहमस्त्रहेतोरटन्नृप॥ ३८॥
अज्ञानाद्धि क्षिपन् बाणान् घोररूपान् भयानकान्।
होमधेन्वा वत्समस्य प्रमत्त इषुणाहनम्॥ ३९॥
 
 
अनुवाद
हे मनुष्यों के स्वामी! एक समय मैं विजय नामक ब्राह्मण के आश्रम में अस्त्र-शस्त्र का अभ्यास करने के लिए घूम रहा था। उस समय मैंने एक भयंकर और भयंकर बाण चलाते समय अनजाने में ही असावधानीवश उस ब्राह्मण की गाय के बछड़े को मार डाला।
 
O Lord of men! Once upon a time, I was roaming around the hermitage of a Brahmin named Vijay to practice weapons. At that time, while shooting a fierce and dangerous arrow, I unknowingly, due to carelessness, killed the calf of that Brahmin's cow. 38-39.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)