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श्लोक 8.42.36-38h  |
वैवस्वताद् दण्डहस्ताद्वरुणाद् वापि पाशिन:।
सगदाद् वा धनपते: सवज्राद् वापि वासवात्॥ ३६॥
अन्यस्मादपि कस्माच्चिदमित्रादाततायिन:।
इति शल्य विजानीहि यथा नाहं बिभेम्यत:॥
तस्मान्न मे भयं पार्थान्नापि चैव जनार्दनात्॥ ३७॥
सह युद्धं हि मे ताभ्यां साम्पराये भविष्यति। |
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| अनुवाद |
| शल्य! मैं दण्डधारी सूर्यपुत्र यमराज, पाशधारी वरुण, गदाधारी कुबेर, वज्रधारी इन्द्र अथवा किसी भी अन्य अत्याचारी शत्रु से कभी नहीं डरता। यह बात तुम्हें अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए। इसीलिए मैं अर्जुन या श्रीकृष्ण से नहीं डरता। मैं युद्धभूमि में उन दोनों से अवश्य युद्ध करूँगा। 36-37 1/2। |
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| ‘Shalya! I am never afraid of Yamaraja, the son of the Sun, holding a rod, Varuna holding a noose, Kubera holding a mace, Indra holding a thunderbolt or any other tyrannical enemy. You must understand this very well. That is why I am not afraid of Arjuna or Shri Krishna. I will definitely fight with both of them on the battlefield. 36-37 1/2. |
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