श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 42: कर्णका श्रीकृष्ण और अर्जुनके प्रभावको स्वीकार करते हुए अभिमानपूर्वक शल्यको फटकारना और उनसे अपनेको परशुरामजीद्वारा और ब्राह्मणद्वारा प्राप्त हुए शापोंकी कथा सुनाना  »  श्लोक 31-32h
 
 
श्लोक  8.42.31-32h 
मित्रं मिन्देर्नन्दते: प्रीयतेर्वा
संत्रायतेर्मिनुतेर्मोदतेर्वा॥ ३१॥
ब्रवीमि ते सर्वमिदं ममास्ति
तच्चापि सर्वं मम वेत्ति राजा।
 
 
अनुवाद
मित्र शब्द मिद्, नन्द, प्रि, त्र, मि अथवा मुद* धातुओं के संयोग से बना है। मैं तुमसे सत्य कहता हूँ - इन सब धातुओं का पूर्ण अर्थ मुझमें विद्यमान है। राजा दुर्योधन इन सब बातों को भली-भाँति जानता है॥ 31 1/2॥
 
‘The word mitra is formed by the fall of the metals Mid, Nand, Pri, Tra, Mi or Mud*. I tell you the truth – the full meaning of all these metals is present in me. King Duryodhana knows all these things very well.॥ 31 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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