श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 42: कर्णका श्रीकृष्ण और अर्जुनके प्रभावको स्वीकार करते हुए अभिमानपूर्वक शल्यको फटकारना और उनसे अपनेको परशुरामजीद्वारा और ब्राह्मणद्वारा प्राप्त हुए शापोंकी कथा सुनाना  »  श्लोक 30-31h
 
 
श्लोक  8.42.30-31h 
कालस्त्वयं प्रत्युपयाति दारुणो
दुर्योधनो युद्धमुपागमद् यत्॥ ३०॥
अस्यार्थसिद्धिं त्वभिकाङ्क्षमाण-
स्तन्मन्यसे यत्र नैकान्त्यमस्ति।
 
 
अनुवाद
बड़ा ही भयंकर समय निकट आ रहा है। राजा दुर्योधन युद्धभूमि में आ पहुँचा है। मैं उसके मनोरथ की सफलता की कामना करता हूँ; किन्तु तुम्हारा मन वहीं लगा हुआ है, जिससे उसके कार्य के सफल होने की कोई संभावना नहीं है ॥30 1/2॥
 
A very dreadful time is approaching. King Duryodhana has arrived on the battlefield. I wish for the success of his desire; but your mind is focused there, due to which there is no possibility of his task being successful. ॥ 30 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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