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mahabharat 8.42.28-29h: मैं ऐसे अप्रिय, क्रूर, नीच और क्षमाहीन मनुष्यों को, जो क्षमाशील मनुष्यों की निन्दा करते हैं, सैकड़ों बार मार सकता हूँ, परन्तु काल की कृपा से मैं यह सब क्षमापूर्वक सहन कर लेता हूँ ॥28 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 8.42: कर्णका श्रीकृष्ण और अर्जुनके प्रभावको स्वीकार करते हुए अभिमानपूर्वक शल्यको फटकारना और उनसे अपनेको परशुरामजीद्वारा और ब्राह्मणद्वारा प्राप्त हुए शापोंकी कथा सुनाना   ।   mahabharat पर्व 8: कर्ण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 42: कर्णका श्रीकृष्ण और अर्जुनके प्रभावको स्वीकार करते हुए अभिमानपूर्वक शल्यको फटकारना और उनसे अपनेको परशुरामजीद्वारा और ब्राह्मणद्वारा प्राप्त हुए शापोंकी कथा सुनाना  »  श्लोक 28-29h
 
 
श्लोक  8.42.28-29h 
अप्रियो य: पुरुषो निष्ठुरो हि
क्षुद्र: क्षेप्ता क्षमिणश्चाक्षमावान्॥ २८॥
हन्यामहं तादृशानां शतानि
क्षमाम्यहं क्षमया कालयोगात्।
 
 
अनुवाद
मैं ऐसे अप्रिय, क्रूर, नीच और क्षमाहीन मनुष्यों को, जो क्षमाशील मनुष्यों की निन्दा करते हैं, सैकड़ों बार मार सकता हूँ, परन्तु काल की कृपा से मैं यह सब क्षमापूर्वक सहन कर लेता हूँ ॥28 1/2॥
 
I can kill hundreds of such unpleasant, cruel, mean-hearted and unforgiving people who slander the forgiving people, but due to the grace of time, I tolerate all this with forgiveness. ॥ 28 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)