श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 42: कर्णका श्रीकृष्ण और अर्जुनके प्रभावको स्वीकार करते हुए अभिमानपूर्वक शल्यको फटकारना और उनसे अपनेको परशुरामजीद्वारा और ब्राह्मणद्वारा प्राप्त हुए शापोंकी कथा सुनाना  »  श्लोक 14-15h
 
 
श्लोक  8.42.14-15h 
प्रमुञ्चन्तं बाणसंघानमेयान्
मर्मच्छिदो वीरहण: सुपत्रान्॥ १४॥
कुन्तीपुत्रं यत्र योत्स्यामि युद्धे
ज्यां कर्षतामुत्तममद्य लोके।
 
 
अनुवाद
इसी प्रकार मैं भी रणभूमि में कुन्तीपुत्र अर्जुन के साथ युद्ध करूँगा, जो इस संसार में धनुष चलाने वाले शूरवीरों में श्रेष्ठ है, जो प्राणों को छेदने वाले, सुन्दर पंखों वाले तथा शूरवीरों का नाश करने में समर्थ असंख्य बाणों के समूह का प्रयोग करता है।॥14 1/2॥
 
Similarly, I too will fight on the battlefield with Arjuna, the son of Kunti, who is the best among the brave bowstring pullers in this world, and who uses innumerable groups of arrows that pierce the vital parts and have beautiful wings and are capable of destroying the brave.॥ 14 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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