श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 42: कर्णका श्रीकृष्ण और अर्जुनके प्रभावको स्वीकार करते हुए अभिमानपूर्वक शल्यको फटकारना और उनसे अपनेको परशुरामजीद्वारा और ब्राह्मणद्वारा प्राप्त हुए शापोंकी कथा सुनाना  »  श्लोक 12-13h
 
 
श्लोक  8.42.12-13h 
अस्त्रं ततोऽन्यत् प्रतिपन्नमद्य
येन क्षेप्स्ये समरे शत्रुपूगान्।
प्रतापिनं बलवन्तं कृतास्त्रं
तमुग्रधन्वानममितौजसं च॥ १२॥
क्रूरं शूरं रौद्रममित्रसाहं
धनंजयं संयुगेऽहं हनिष्ये।
 
 
अनुवाद
उस ब्रह्मास्त्र से भिन्न मुझे एक और अस्त्र भी प्राप्त हो गया है, जिससे आज रणभूमि में मैं शत्रु समूहों का संहार करूँगा तथा समरभूमि में उस भयंकर धनुर्धर, अमर, यशस्वी, बलवान, अस्त्रविद्या में निपुण, क्रूर, पराक्रमी, भयंकर और शत्रुओं के भीषण वेग को सहने में समर्थ अर्जुन को भी मार डालूँगा॥12 1/2॥
 
I have also got another weapon different from that Brahmastra, with which today in the battlefield I will kill the enemy groups and I will also kill in the battle that fierce archer, immortal, glorious, strong, adept at weapons, cruel, valiant, fierce and capable of withstanding the fierceness of the enemies, Arjuna. 12 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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