श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 41: राजा शल्यका कर्णको एक हंस और कौएका उपाख्यान सुनाकर उसे श्रीकृष्ण और अर्जुनकी प्रशंसा करते हुए उनकी शरणमें जानेकी सलाह देना  »  श्लोक 58
 
 
श्लोक  8.41.58 
वयं काका: कुतो नाम चराम: काकवाशिका:।
हंस प्राणै: प्रपद्ये त्वामुदकान्तं नयस्व माम्॥ ५८॥
 
 
अनुवाद
‘भैया हंस! हम तो कौवे हैं। व्यर्थ ही काँव-काँव करते रहते हैं। हमें उड़ना कैसे आएगा? मैं प्राणों की शरण लेकर आपकी शरण में आया हूँ। कृपया मुझे जल के किनारे ले चलो।’॥58॥
 
‘Brother swan! We are crows. We keep on cawing in vain. How would we know how to fly? I have come to you with my life in refuge. Please take me to the water’s edge.’॥ 58॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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