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श्लोक 8.41.58  |
वयं काका: कुतो नाम चराम: काकवाशिका:।
हंस प्राणै: प्रपद्ये त्वामुदकान्तं नयस्व माम्॥ ५८॥ |
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| अनुवाद |
| ‘भैया हंस! हम तो कौवे हैं। व्यर्थ ही काँव-काँव करते रहते हैं। हमें उड़ना कैसे आएगा? मैं प्राणों की शरण लेकर आपकी शरण में आया हूँ। कृपया मुझे जल के किनारे ले चलो।’॥58॥ |
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| ‘Brother swan! We are crows. We keep on cawing in vain. How would we know how to fly? I have come to you with my life in refuge. Please take me to the water’s edge.’॥ 58॥ |
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