श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 41: राजा शल्यका कर्णको एक हंस और कौएका उपाख्यान सुनाकर उसे श्रीकृष्ण और अर्जुनकी प्रशंसा करते हुए उनकी शरणमें जानेकी सलाह देना  »  श्लोक 56-57
 
 
श्लोक  8.41.56-57 
शल्य उवाच
स पक्षाभ्यां स्पृशन्नार्तस्तुण्डेन च जलं तदा।
दृष्टो हंसेन दुष्टात्मन्निदं हंसं ततोऽब्रवीत्॥ ५६॥
अपश्यन्नम्भस: पारं निपतंश्च श्रमान्वित:।
पातवेगप्रमथितो हंसं काकोऽब्रवीदिदम्॥ ५७॥
 
 
अनुवाद
शल्य कहते हैं - हे दुष्ट कर्ण ! वह कौआ अत्यन्त पीड़ा से पीड़ित होकर अपने दोनों पंखों और चोंच से जल को छूने लगा था। हंस ने उसे उस अवस्था में देखा। वह उड़ने के वेग से थक गया था और जल का कोई छोर न देखकर नीचे गिर रहा था। उस समय उसने हंस से यह कहा -॥56-57॥
 
Shalya says - Evil souled Karna! That crow was in great pain and started touching the water with both his wings and beak, the swan saw him in that condition. He was tired due to the speed of flying and was falling down without seeing any end of the water. At that time he said this to the swan -॥ 56-57॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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