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mahabharat 8.41.48-49h: हे सारथिपुत्र कर्ण! समुद्र में विचरण करने वाले मनुष्य भी सब दिशाओं में फैले हुए समुद्र की गहराई को नहीं जान पाते, फिर वह कौआ उस समुद्र के जलराशि को कुछ दूर तक उड़कर कैसे पार कर गया?॥48 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 8.41: राजा शल्यका कर्णको एक हंस और कौएका उपाख्यान सुनाकर उसे श्रीकृष्ण और अर्जुनकी प्रशंसा करते हुए उनकी शरणमें जानेकी सलाह देना   ।   mahabharat पर्व 8: कर्ण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 41: राजा शल्यका कर्णको एक हंस और कौएका उपाख्यान सुनाकर उसे श्रीकृष्ण और अर्जुनकी प्रशंसा करते हुए उनकी शरणमें जानेकी सलाह देना  »  श्लोक 48-49h
 
 
श्लोक  8.41.48-49h 
गाम्भीर्याद्धि समुद्रस्य न विशेषं हि सूतज।
दिगम्बराम्भस: कर्ण समुद्रस्था विदुर्जना:॥ ४८॥
विदूरपातात् तोयस्य किं पुन: कर्ण वायस:।
 
 
अनुवाद
हे सारथिपुत्र कर्ण! समुद्र में विचरण करने वाले मनुष्य भी सब दिशाओं में फैले हुए समुद्र की गहराई को नहीं जान पाते, फिर वह कौआ उस समुद्र के जलराशि को कुछ दूर तक उड़कर कैसे पार कर गया?॥48 1/2॥
 
O son of a charioteer, Karna! Even the men who travel in the sea are unable to know the depth of the sea covered by all directions, so how could that crow cross the mass of water of that sea just by flying for some distance?॥ 48 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)