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श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 41: राजा शल्यका कर्णको एक हंस और कौएका उपाख्यान सुनाकर उसे श्रीकृष्ण और अर्जुनकी प्रशंसा करते हुए उनकी शरणमें जानेकी सलाह देना  »  श्लोक 45-46h
 
 
श्लोक  8.41.45-46h 
ततो भी: प्राविशत् काकं तदा तत्र विचेतसम्॥ ४५॥
द्वीपद्रुमानपश्यन्तं निपातार्थे श्रमान्वितम्।
 
 
अनुवाद
कौआ थका हुआ था। उसे शरण लेने के लिए कोई द्वीप या पेड़ नज़र नहीं आ रहा था; इसलिए उसके मन में भय समा गया और वह घबराकर बेहोश हो गया। 45 1/2
 
The crow was tired. He could not see any island or tree to take shelter; hence fear entered his mind and he became nervous and fainted. 45 1/2
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)