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श्लोक 8.41.35-37h  |
अथ काका: प्रजहसुर्ये तत्रासन् समागता:॥ ३५॥
कथमेकेन पातेन हंस: पातशतं जयेत्।
एकेनैव शतस्यैष पातेनाभिभविष्यति॥ ३६॥
हंसस्य पतितं काको बलवानाशुविक्रम:। |
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| अनुवाद |
| तब वहाँ उपस्थित सभी कौवे ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगे और आपस में कहने लगे, 'यह हंस एक ही उड़ान में सौ प्रकार की उड़ानों को कैसे परास्त कर सकता है? यह कौआ बलवान है और तेज़ उड़ता है; अतः यह हंस की उड़ान को सौ उड़ानों में से एक में ही परास्त कर देगा।' 35-36 1/2 |
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| Then all the crows present there started laughing loudly and said among themselves, 'How can this swan defeat a hundred types of flights in just one flight? This crow is strong and flies fast; hence, it will defeat the flight of the swan in just one of the hundred flights.' 35-36 1/2 |
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