श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 40: कर्णका शल्यको फटकारते हुए मद्रदेशके निवासियोंकी निन्दा करना एवं उसे मार डालनेकी धमकी देना  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  8.40.6 
अस्ति वायमिषु: शल्य सुपुङ्खो रक्तभोजन:।
एकतूणीशय: पत्री सुधौत: समलंकृत:॥ ६॥
 
 
अनुवाद
हे शल्य! यह मेरा सुन्दर पंखयुक्त बाण शत्रुओं का रक्त पीता है। यह एकान्त में एक तरकस में रखा है, जो अत्यन्त स्वच्छ, पंखयुक्त और सुशोभित है। ॥6॥
 
O Shalya! This beautiful feathered arrow of mine drinks the blood of the enemies. It is kept alone in a quiver which is very clean, has a feather leaf and is well decorated. ॥ 6॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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