श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 40: कर्णका शल्यको फटकारते हुए मद्रदेशके निवासियोंकी निन्दा करना एवं उसे मार डालनेकी धमकी देना  »  श्लोक 47-48h
 
 
श्लोक  8.40.47-48h 
कामं न खलु शक्योऽहं त्वद्विधानां शतैरपि॥ ४७॥
संग्रामाद् विमुख: कर्तुं धर्मज्ञ इव नास्तिकै:।
 
 
अनुवाद
जैसे सैकड़ों नास्तिक मिलकर भी धार्मिक पुरुष को धर्ममार्ग से नहीं डिगा सकते, वैसे ही तुम्हारे जैसे सैकड़ों पुरुष मिलकर भी मुझे युद्ध करने से नहीं डिगा सकते, यह निश्चित है ॥47 1/2॥
 
Just as hundreds of atheists together cannot dissuade a religious man from his religious path, similarly even hundreds of men like you cannot dissuade me from fighting the war, this is certain. ॥ 47 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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