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mahabharat 8.40.44-45h: शस्त्रों से युद्ध करते हुए प्राणों का त्याग करना मेरे लिए उत्तम कर्म है, क्योंकि मैं मरने के बाद स्वर्ग प्राप्त करना चाहता हूँ ॥44 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 8.40: कर्णका शल्यको फटकारते हुए मद्रदेशके निवासियोंकी निन्दा करना एवं उसे मार डालनेकी धमकी देना   ।   mahabharat पर्व 8: कर्ण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 40: कर्णका शल्यको फटकारते हुए मद्रदेशके निवासियोंकी निन्दा करना एवं उसे मार डालनेकी धमकी देना  »  श्लोक 44-45h
 
 
श्लोक  8.40.44-45h 
आयुधानां साम्पराये यन्मुच्येयमहं तत:॥ ४४॥
ममैष प्रथम: कल्पो निधने स्वर्गमिच्छत:।
 
 
अनुवाद
शस्त्रों से युद्ध करते हुए प्राणों का त्याग करना मेरे लिए उत्तम कर्म है, क्योंकि मैं मरने के बाद स्वर्ग प्राप्त करना चाहता हूँ ॥44 1/2॥
 
It is a first class deed for me to sacrifice my life in a battle fought with weapons, because I desire to attain heaven after death. ॥ 44 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)